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Monday, November 13, 2017

जोगी मन.. औघड़बाबा

खिलते चमकते दियों की रोशनी में जगमग इस शाम को आज रंगीन कर लेते हैं... हम भी हिस्सा हैं इस कायनात का, आओ मिल कर इस जहां को हसीं कर देते हैं।

गर है सच्ची इबादत तो दुआ कबूल होगी तेरी उस दरबार में, पहले उस माँ सर्वेश्वरी पर यकीन तो कर लेते हैं... अंधेरों को काट, रोशनी भर, आत्मविश्वास की अलख जगा... जोगी है जो मन, 'औघड़ बाबा कहलन' को अंतर्लीन कर लेते हैं। 

- Vijay Yadav "एक रमता फ़कीर"

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Friday, October 27, 2017

सिगरेट नहीं पी रहा था वो...

सिगरेट नहीं पी रहा था वो, होंठो को जला रहा था.. नहीं, शायद दिल को जला रहा था। रहता था जो उसके दिल में घर बना कर कभी, उसे भुलाने की नादां कोशिश कर रहा था।

कश ले रहा था, या धुआं उड़ा रहा था, आशिक़ रहा होगा कोई, जो यादों के अक्स बना रहा था। इश्क़ की तराजू पर उसको मिला जो सिला, मुहब्बत की जमीं पर खुद को माक़ूल शख्स बना रहा था।

सिगरेट नहीं पी रहा था वो...

Vijay Yadav 'एक रमता फ़कीर'

कोई कोशिश मैं न करु

भूल तोे तुम भी ना पाओगे, यक़ीन है अब,
तुम्हें भुलाने की भी कोई कोशिश मैं न करूं।

आये हो फिर से हमारी गली में जो तुम,
मिलने की भी कोई कोशिश मैं न करूं।

बेवफा बनाया हमें वक़्त ने, एहसास है जरूर,
वफ़ा को बयां करे वो कोई कोशिश मैं न करुं।

इम्तिहान ले रहा वक़्त हमारा, कैसेे टूट के बिखर जाऊं,
जिंदा निभे रिश्ते मनाने की कोई कोशिश मैं न करूं।

विजय यादव 'एक रमता फ़कीर'