सिगरेट नहीं पी रहा था वो, होंठो को जला रहा था.. नहीं, शायद दिल को जला रहा था। रहता था जो उसके दिल में घर बना कर कभी, उसे भुलाने की नादां कोशिश कर रहा था।
कश ले रहा था, या धुआं उड़ा रहा था, आशिक़ रहा होगा कोई, जो यादों के अक्स बना रहा था। इश्क़ की तराजू पर उसको मिला जो सिला, मुहब्बत की जमीं पर खुद को माक़ूल शख्स बना रहा था।
सिगरेट नहीं पी रहा था वो...